दूसरी बार राष्‍ट्रपति बनने का ख्‍वाब संजोए ट्रंप का कमजोर और मजबूत पक्ष,दस बिंदुओं में जानें

नई दिल्‍ली, राजनीति संदेश [ब्यूरो] । अमेरिका के राष्‍ट्रपति चुनाव के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे ही चुनावी शोर भी बढ़ने लगा है। राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप कोविड-19 से संक्रमित होने और ठीक होने के बाद दोबार चुनावी मैदान में आ गए हैं। वहीं उनके प्रतिद्वंदी डेमोक्रेट पार्टी के जो बिडेन लगातार रैलियां कर अपने समर्थन में वोट मांग रहे हैं। दोनों ही इस चुनाव में अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। हालांकि, दोनों के ही कुछ मजबूत तो कुछ कमजोर पक्ष हैं। आज हम दोनों के इन्‍हीं पक्ष के बारे में आपको जानकारी देंगे।

मजबूती

  • ट्रंप ने अपनी छवि एक वैश्विक नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की है। इस चुनाव में वो लगातार पूरी दुनिया में उनके द्वारा किए गए शांति और विकास प्रयासों को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। उत्‍तर कोरिया के साथ संबंधों को बेहतर करने की कोशिश की बदौलत भी उनकी इस छवि को बल मिला है। अपने इस कार्यकाल के दौरान उन्‍होंने न सिर्फ उत्‍तर कोरिया के तानाशाह को अपना दोस्‍त बताया था बल्कि उनसे तीन बार मुलाकात तक की। वो पहले ऐसे राष्‍ट्रपति भी हैं जो पद पर रहते हुए उत्‍तर कोरिया की सीमा के अंदर गए और किम से हाथ मिलाया। उनके इन्‍हीं प्रयासों की बदौलत कोरियाई प्रायद्वीप में शांति बहाली की उम्‍मीद जगने लगी थी। उनके प्रयासों की बदौलत उत्‍तर और दक्षिण कोरिया में भी संबंध बेहतर हुए थे।
  • ट्रंप ने अपने कार्यकाल में अमेरिका फर्स्‍ट और अमेरिकन फर्स्‍ट का नारा दिया। वो शुरुआत से ही कहते आए हैं कि अमेरिका में पैदा होने वाली नौकरियों पर पहला हक वहां के लोगों का है। यही वजह है कि उन्‍होंने वीजा नियमों को कड़ा किया, जिससे अधिक से अधिक नौकरियां वहां के नागरिकों को मिल सकें।
  • अफगानिस्‍तान से अपनी सेना की वापसी को लेकर ट्रंप ने जो कदम बढ़ाया है उससे वहां पर वर्षों से तैनात सुरक्षाबलों को राहत जरूर मिली है। इस वापसी को सुनिश्चित बनाने के लिए उन्‍होंने अफगानिस्‍तान में न सिर्फ तालिबान से शांतवार्ता की बल्कि उनके साथ समझौता भी किया। इस शांतिवार्ता के अगले दौर में अब तालिबान और अफगानिस्‍तान की सरकार अमेरिका की मध्‍यस्‍थता में बातचीत कर रही है।

कमजोरी

  • ट्रंप ने इंडो पेसेफिक पॉलिसी की शुरुआत की जिसमें भारत को तवज्‍जो मिली। इसकी वजह से भारत का एशिया में कद और बढ़ गया। चीन के बढ़ते कदमा को रोकने की कोशिश के मद्देनजर उन्‍होंने भारत के रुख का समर्थन किया। इसकी वजह से अमेरिका में रहने वाले भारतीयों में उनकी छवि काफी बेहतर हुई। यही वजह है कि डेमोक्रेट का पारंपरिक भारतीय वोट अब बंटा हुआ दिखाई दे रहा है।
  • ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका में सबसे अधिक लोग बेरोजगार हुए हैं। कोविड-19 की ही वजह से लाखों लोगों की जॉब छिन गई है। इन लोगों ने सरकार द्वारा बेरोजगारों को दी जाने वाली आर्थिक मदद के लिए अपना नाम रजिस्‍टर्ड करवाया है।
  • ट्रंप के कार्यकल में नस्‍लभेद की भी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिसकी वजह से लोगों में ट्रंप के प्रति काफी रोष है। इसी वर्ष में एक अश्‍वेत नागरिक की पुलिस की मार की वजह से जान चली गई थी जबकि दूसरे को पुलिसकर्मियों द्वारा गोली मारे जाने के बाद गंभीर हालत में अस्‍पताल भर्ती कराया गया था। इन दोनों घटनाओं के बाद अमेरिका के कई राज्‍यों में प्रदर्शन हुए थे।
  • अमेरिका कोविड-19 के मामलों में काफी समय से दुनिया के देशों में शीर्ष पर बना हुआ है। कोविड-19 को लेकर बनने वाली वैक्‍सीन को लेकर भी उन्‍होंने कई बार बयानों को बदला है। इतना ही नहीं उन्‍होंने इस मामले में एक्‍सपर्ट की राय को न सिर्फ दरकिनार किया बल्कि उन्‍हें सार्वजनिकतौर पर नीचा दिखाने की कोशिश भी की। डॉक्‍टर फॉसी इसका जीता जागता उदाहरण हैं।
  • ट्रंप ने उनके करीबी कहे जाने वाले एनएसए जॉन बॉल्‍टन को पद से हटाने से पहले उनकी सार्वजनिकतौर से आलोचना की थी। इसके बाद उनकी छवि को काफी धक्‍का लगा था।
  • ट्रंप के बारे में कहा जाता है कि उनके द्वारा लिए गए बड़े फैसलों में उनकी बेटी और दामाद की अहम भूमिका होती है। इसी वजह से इन दोनों को पर्दे के पीछे छिपी बड़ी ताकत बताया जाता है। इजरायल-यूएई और इजरायल और बहरीन करार में भी इनकी अहम भूमिका थी।
  • स्‍थानीय मुद्दे पर ट्रंप काफी कमजोर रहे हैं यही वजह है कि वो इस चुनाव में अंतरराष्‍ट्रीय मुद्दों को उठाकर अपनी किस्‍मत चमकाने की कोशिश कर रहे हैं।
  • उनके कार्यकाल में अमेरिका कई तरह के विवादों में पड़ा है। डब्‍ल्‍यूएचओ को दी जाने वाली अमेरिकी फंडिंग पर रोक, पेरिस समझौते का पालन न करना, वैश्विक संस्‍था डब्‍ल्‍यूएचओ पर लगातार सवाल उठाना, ईरान से परमाणु डील को रद करने जैसे कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसकी वजह से अमेरिका विवादों में घिरा। अपने कार्यकाल में उन्‍होंने पूर्व की सरकारों के फैसलों को बदलने में ज्‍यादा तवज्‍जो दी।

राजनीति संदेश [ब्यूरो]

 

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