बीते सात दशकों से जेलों में सुधार के लिए नहीं हुआ कोई काम,एनसीआरबी की रिपोर्ट में खुलासा

नई दिल्ली, राजनीति संदेश [अनूप जी प्रधान] । बीते सात दशकों से जेलों में सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं देश की जेलों और वहां बंद कैदियों के हालात बहुत अधिक खराब है।जिसकी वजह से जेल में बंद कैदियों को नरकीय जीवन जीना पड़ता है।और तो और कई कैदी तो इतने गरीब है कि बेगुनाह होते हुए भी उनका केस लड़ने वाला कोई नहीं है जिसकी वजह से वो जेल की चारदीवारी में बंद है और भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं। एनसीआरबी ने अपने जो ताजा आंकड़े जारी किए हैं उनको देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है। जेलों में प्राकृतिक और अप्राकृतिक तौर पर मौतों के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं।

जेलों की स्थिति 

भारतीय जेलों की स्थिति ये है कि कुल कैदियों में से साढ़े 68 प्रतिशत विचाराधीन हैं। यानी उनके मामले लंबित हैं। उनकी फाइल अदालतों, कचेहरियों और जेलों के बीच कहीं अटकी पड़ी हैं। सबसे ज्यादा क्षमता से अधिक कैदियों की संख्या दिल्ली की जेलों मे हैं जहां सौ लोगों की जगह में 175 लोग बंद हैं। इसके बाद यूपी और उत्तराखंड का नंबर आता है। महिला जेलों की स्थिति भी कुछ कम चिंताजनक नहीं। भीड़ भले ही अपेक्षाकृत कम है लेकिन तीन राज्यों, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार में महिला कैदियों का ऑक्युपेंसी रेट 100 प्रतिशत से अधिक का है।

दलित, मुस्लिम और आदिवासी जेलों में बंद 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने जेलों पर अपना ताजा आंकड़ा जारी किए हैं। इसके मुताबिक जेलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम, आदिवासी और दलित वर्ग के लोग बंद हैं। 2019 के आंकड़ों के मुताबिक विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या मुस्लिमों की है। देश भर की जेलों में दोषसिद्ध कैदियों में सबसे ज्यादा संख्या दलितों की है, 21.7 प्रतिशत। अनुसूचित जाति के विचाराधीन कैदियों का प्रतिशत है 21, जबकि 2011 की जनगणना में उनका हिस्सा 16.6 प्रतिशत का है।

जनजातियों (आदिवासियों) में भी यही स्थिति हैं। दोषी करार दिए गए कैदियों में वे 13.6 प्रतिशत हैं और विचाराधीन कैदियों में साढ़े दस प्रतिशत। जबकि देश की कुल आबादी में वे लगभग साढ़े आठ प्रतिशत हैं। मुसलमानों की संख्या देश की आबादी में 14.2 प्रतिशत है लेकिन जेल के भीतर दोषसिद्ध कैदियों में साढ़े 16 प्रतिशत से कुछ अधिक उनकी संख्या है और विचाराधीन कैदियों में 18.7 प्रतिशत।

न्याय प्रणाली के विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे भारत की आपराधिक न्याय पद्धति की बहुत सी कमजोरियों का पता चलता है और ये भी कि गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई कितनी कठिन है। जिन्हें अच्छे और महंगे वकील मिल जाते हैं उनकी जमानत आसानी से हो जाती है। बहुत मामूली से अपराधों के लिए भी गरीब लोग जेल में सड़ने को विवश होते हैं।

 

जेल सुधारों की सिफारिश 

पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट की चयनित उच्चस्तरीय जेल सुधार कमेटी ने 300 पेज की रिपोर्ट में विस्तार से तमाम मुद्दों और जरूरतों पर ध्यान खींचा था। उनकी सिफारिशें कितनी सूक्ष्म और व्यापक हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनमें आधुनिक साफ सुथरी रसोई, व्यवस्थित कैंटीन, जरूरी खाद्य सामानों की उपलब्धता से लेकर जेल में अपना पहला हफ्ता काटते हुए दिन में एक बार कैदियों को मुफ्त फोन कॉल की अनुमति और वीडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिए मुकदमों की सुनवाई करने जैसी महत्त्वपूर्ण सिफारिशें तक शामिल हैं। ये रिपोर्ट अदालत को सौंपी जा चुकी है और खबरों के मुताबिक एमीकस क्यूरी को अध्ययन के लिए भेजी गयी है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफतौर पर माना है कि जेलों पर बोझ है, संख्या से अधिक कैदी जेलों में ठुंसे हुए हैं और एक तरह से कैदी ही नहीं उसके सम्मान का भी मानवाधिकार हनन होता है। कमेटी के मुताबिक हर 30 कैदियों पर कम से कम एक वकील उपलब्ध होना ही चाहिए। तेजी से मामलों की सुनवाई हो तो कैदियों को भी राहत मिलेगी और जेलों पर भी अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा। साथ ही जेलों में खाली पद भी तत्काल प्रभाव से भरे जाने

चाहिए।माना जाता है कि जेल विभाग में सालाना तौर पर 30 से 40 प्रतिशत पद खाली रह जाते हैं। जेलों की चरमराई व्यवस्था के बीच जेलों में कैदियों की पिटाई और उनकी मौतों के मामले भी मानवाधिकार अधिकारों के लिहाज से बड़े संकट हैं। एक बहुत व्यापक, नैतिक और पारदर्शी अभियान चलाए बिना और जवाबदेही तय किए बिना तो जेलों को आदर्श सुधार-गृह में तब्दील कर पाना मुमकिन नहीं।

Posted By: ANOOP JI PRADHANA

 

 

 

...