लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती पर जानें उनके जीवन से जुड़ी रोचक बातें

नई दिल्ली, राजनीति संदेश [रुद्रांश पान्डेय] । ‘स्वराज यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा’ का नारा देने वाले, महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की आज जयंती है। उनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरी) के चिखली गांव में हुआ था। बाल गंगाधर तिलक को लोकमान्य तिलक के नाम से भी जाना जाता है। लोकमान्य का शीर्षक भी इन्हीं को दिया गया था। स्वतंत्रता सेनानी के अलावा उनको समाज सुधारक, दार्शनिक, प्रखर चिंतक, शिक्षक और पत्रकार के तौर पर भी जाना जाता है।

बचपन से ही थे मेधावी

बाल गंगाधर तिलक बचपन से ही मेधावी छात्र थे और रत्नागिरी गांव से निकलकर आधुनिक कालेज में शिक्षा पाने वाले ये भारतीय पीढ़ी के पहले पढ़े लिखे नेता थे। कुछ समय तक उन्होंने स्कूल और कॉलेज के छात्रों को गणित की भी शिक्षा दी। उन्होंने देश में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए काफी काम किया, इसके लिए उन्होंने दक्कन शिक्षा सोसायटी की भी स्थापना की थी।

कैसी रही राजनीतिक यात्रा

ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध चलते एक समय उन्हें मुकदमे और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। उन्होंने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन करके काफी समय तक काम किया, लेकिन बाद में पार्टी नरमपंथी रवैये को देखते हुए वो अलग हो गए। इसके बाद पार्टी के दो हिस्से हो गए, और बाल गंगाधर तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल, अलग हिस्से में शामिल हो गए। 1908 में तिलक ने क्रान्तिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गए और 1916 में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की। इसके अलावा ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना करने और भारतीयों को पूर्ण स्वराज देने की मांग के चलते उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।उन्होंने अपने अखबारों के जरिए भी ब्रिटिश शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। वो अपने मराठी अखबार ‘केसरी’ में अंग्रेजों के खिलाफ काफी आक्रामक लेख लिखते थे। इन्हीं लेखों की वजह से उनको कई बार जेल भेजा गया।

Posted By: RUDRANSH PANDEY

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